Wednesday, March 20, 2019
SPARSH: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता
SPARSH: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है , लोगों का कहना है कि पश्चिमी सभ्यता ने भारत को अपने मोहपाश...
Tuesday, March 19, 2019
पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता
पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता
भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है , लोगों का कहना है कि पश्चिमी सभ्यता ने भारत को अपने मोहपाश में जकड़ रखा है। लेकिन ये कहना कहाँ तक न्यायसंगत है ? समाज पूर्वी हो या पश्चिमी दोनों की अपनी संस्कृति है। चाहे देश कोई भी हो उसकी संस्कृति उसकी आत्मा होती है। किसी भी सिक्के के दो पहलू हो सकते हैं , अब इसमें हमे तय करना होता है की हम उनमे से किसका आवरण करते हैं। एक तरफ हम जहाँ गगन छूने की बातें करते हैं तो वही दूसरी ओर हमें पश्चिमीकरण का डर भी सताने लगता है. यहाँ हमे आरोप प्रत्यारोप करने की बजाय उन जड़ो तक पहुंचना होगा जिसने हमे पश्चिमी सभ्यता का रुख करने को बाध्य किया है। पश्चिमी संस्कृति से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जैसे उनके काम करने के तरीके , विज्ञान की दुनियां में उनके बढ़ते हुए कदम , नित्य नयी तकनीक का विकास। तकनीक का उपयोग और दुरूपयोग हमारे ऊपर निर्भर करता है ना कि पाश्चात्य सभ्यता को गलत ठहराया जा सकता है पूर्णरूप से। युवा वर्ग में तनाव ने अपनी एक खास जगह बना ली है , इसका कारण पाश्चात्य सभ्यता नहीं है बल्कि एकल परिवार है . दादी माँ की परियो की कहानी की जगह अब पब जी गेम ने ले लिया है , जिससे हमारे मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है। भारत में बढ़ती बेरोजगारी सबसे अहम् मुद्दा है जो हमें पश्चिमीकरण की तरफ ढ़केल रहा है। कभी सोने की चिड़या कहा जाने वाला भारत एक कृषि प्रधान देश है , लेकिन बेहतर कृषि तब ही संभव है जब प्रकृति हमारा साथ दे और नयी तकनीक का हम सहारा ले सकें और अच्छी तकनीक के लिए हमें पश्चिमी सभ्यता को अपनाना होगा। हमारा भारत सभ्यता और संस्कृति के मामले सर्वश्रेष्ठ है, ये सर्वविदित है।
अब सवाल उठता है कि क्या भारत को विकसित देश होने के लिए पाश्चात्य की तरफ रुख करना सही है? क्या युवा वर्ग पाश्चात्य की तरफ रुख करके उनके गुलाम बनते जा रहे हैं ? मेरे हिसाब से किसी जगह की संस्कृति अपनाने का मतलब ये नहीं की हम अपनी जड़ो को ही हिला दें. आधुनिक सोच के साथ कपड़ों में सहूलियत के साथ कुछ बदलाव आना भी लाज़मी है लेकिन ये अब हम पर निर्भर करता है कि किसी दूसरे की संस्कृति को अपनाने में खुद की संस्कृति को गौण न कर दें. मात्र जीन्स या साड़ी के पहनावे मात्र से किसी भी इंसान की सभ्यता और संस्कृति नहीं बदल सकती। हमारा पोशाक चाहे जो भी हो बदलते ज़माने के हिसाब से हो सकता है पर उस पहनावे में फुहड़ता और सस्तापन नहीं होना चाहिए। ये पूरी तरह से किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर निर्भर है कि वो भारत से बाहर जाकर भी अपनी संस्कृति से विमुख नहीं हो।
अचानक से हमें यहाँ इकबाल जी की कही हुई बात याद आ रही है :
" कुछ बात है कि ऐसी हस्ती मिटती नहीं हमारी "
हमें कोई हक़ नहीं बनता की हम दूसरों की संस्कृति को गलत कह सके वो भी तब जब हम उसे खुद अपना रहें हो। किसी भी देश का विकास तब सम्भव है जबकि पश्चिम के भौतिकवाद और पूर्व के अध्यातमवाद का सामंजस्यपूर्ण सम्मिश्रण जो समस्त संसार को प्रसन्नता दे सके। आजतक भारत की कोई अपनी शिक्षा निति नहीं है , आज भी शिक्षा प्रणाली में भारत मैकाले की दी हुई पद्धति अपना रहा है। इस तरह की शिक्षा नीति में मानवीय विकास के कई पहलूओं की अनदेखी की गयी है। वहीँ अगर हम मानसिक सुदृढ़त्ता की बात करें तो भौतिकवादी सोच में ये नष्ट होते हुए प्रतीत हो रहें हैं।
यदि हम मानवीय मूल्यों के विकास की बात करें तो वो आध्यात्मिक चिंतन से विकसित होता है , जो कि पाश्चात्य संस्कृति के आधीनता में अस्वीकार्य है। तकनीक का सही उपयोग की जगह उसका दुरूपयोग ने मानवीय रिश्तों में दरार बढ़ाया है , लोगो में भावनात्मकता की कमी साफ़ झलकती है। हर एक इंसान आगे बढ़ने की होड़ में है एक दूसरे से , बिना परिणाम की चिंता किये हुए।
इसलिए हम ये कह सकते हैं कि कोई भी संस्कृति पूरी तरह से दोषपूर्ण नहीं है , बस उसका सदुपयोग करके हम विनाश से बच सकते हैं. मनुष्य का पतन और उत्थान अपने हाथ में है वो किसी संस्कृति का मोहताज नहीं , बस देश को विकासशील से विकसित बनाने के लिए पूर्वी और पश्चिमी का आपसी तालमेल होना जरुरी है। जब उदारीकरण और वैश्वीकरण होंगे तो उसके परिणाम भी हमें ही झेलने होने चाहे उसका रुख पूर्व की ओर जाता हो या पश्चिम की ओर। अब हम अपनी संस्कृति की साख को हिलने न दे ये पूर्ण रूप से मानव पर निर्भर करता है.
Monday, February 25, 2019
भारतीय गैस उद्योग के विकास में मौके और चुनौतियां; डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई
भारतीय गैस उद्योग के विकास में मौके और चुनौतियां; डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई
नई दिल्ली, 25 फरवरी 2019 - राजधानी में 22 फरवरी 2019 को एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया था । इसका विषय था, “भारत में प्राकृतिक गैस उद्योग : भारतीय गैस उद्योग में मौके और चुनौतियां”। यह आयोजन पीडीपीयू-जीटीआई भारतीय गैस उद्योग के साथ मिलकर किया गया। इसमें इस क्षेत्र के जाने-माने वक्ताओं ने उद्योग की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की और उसपर प्रकाश डाला।
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| प्राकृतिक गैस उद्योग कार्यशाला २०१९ पीडीपीयू द्वारा आयोजित |
यह कार्यशाला 2017 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्त इच्छा का परिणाम था । उस समय उन्होंने कहा था कि भारत में प्राकृतिक गैस के विकास के लिए वे चाहेंगे कि गैस टेक्नालॉजी इंस्टीट्यूट, इलिनोइस और पंडित दीन दयाल उपाध्याय पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी (पीडीपीयू), गांधीनगर के बीच एक गठजोड़ की शुरुआत की जाए।
इस सिलसिले में पीडीपीयू ने अप्रैल 2018 में एक ओपन हाउस का आयोजन किया था। इसमें चर्चा का विषय था, “इंडिया टुवार्ड्स गैस बेस्ड इकनोमी” (भारत गैस आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में)। इसमें डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई ने मौजूद लोगों को संबोधित किया था और भारत के प्राकृतिक गैस क्षेत्र के विकास के लिए अपने विचार तथा दृष्टिकोण साझा किए थे। इस कदम को आगे बढ़ाते हुए, पीडीपीयू और जीटीआई ने अब इस कार्यशाला का आयोजन किया है।
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| आईजीयू के इमीडिएट पास्ट प्रेसिडेंट और सीईओ डेविड कैरॉल |
इंटरनेशनल गैस यूनियन (आईजीयू) के इमीडिएट पास्ट प्रेसिडेंट और सीईओ डेविड कैरॉल ने “प्राकृतिक गैस विकास पर अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य" पर अपने विचार रखे। अपनी प्रस्तुति की शुरुआत उन्होंने 2017 के वर्ल्ड गैस कांफ्रेंस की द्रुत समीक्षा से की और बताया कि दुनिया के हर कोने में और मुख्य रूप से चीन में गैस की मांग काफी बढ़ गई है। यही नहीं, एशियाई स्पॉट बाजार में कीमतें बढ़ गई हैं।
उन्होंने आगे कहा, “2018 के आंकड़े अभी आ रहे हैं पर यह स्पष्ट है कि एशियाई बाजार मांग बढ़ा रहे हैं। और एफएलएनजी प्रील्यूड ने अभी कुछ महीने पहले उत्पादन शुरू किया है तो आपूर्ति पक्ष अच्छा है और अमेरिकी सप्लाई भी बहुत बढ़ गई है। आईईए ने अनुमान लगाया है कि 2040 तक गैस की वार्षिक मांग में
1.6% की वृद्धि होगी। शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों में खराब हवा का मामला आबादी के ज्यादातर हिस्से और इसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस के विकास को प्रभावित कर रहा है।”
गैस टेक्नालॉजी इंस्टीट्यूट में बिजनेस डेवलपमेंट एंड एजुकेशन के रॉड रिनहोल्म ने अमेरिका में गैस उद्योग के परिदृश्य साझा किए। उन्होंने अमेरिकी प्राकृतिक गैस आपूर्ति श्रृंखला का संक्षिप्त विवरण दिया जहां उन्होंने अमेरिका की स्थिति बदलने पर जोर दिया। इस समय अमेरिका गैस का आयात करता है और यह गैस का निर्यात करने वाला देश बन सकता है। और 2019 के अंत तक इसका लक्ष्य इसके निर्यात का दुगना है। उन्होंने कहा, “अमेरिका निरंतर अपने गैस डोमेन में जा रहा है। यह मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है – आवासीय, व्यावसायिक और बिजली पैदा करने वाला औद्योगिक गैस।“
डॉ. अनिरबिड सिरकर, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ पेट्रोलियम टेक्नालॉजी, पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी
डॉ. अनिरबिड सिरकर, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ पेट्रोलियम टेक्नालॉजी, पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी ने विस्तार से मुख्य जानकारी और गैस उद्योग से जुड़े मुद्दे साझा किए जैसा कि वेब आधारित सर्वे तरीके में हाईलाइट किया गया है। इसे “सर्वे मंकी” कहा जाता है। इस रिपोर्ट में 12 भिन्न गैस कंपनियों के नजरिए पर रोशनी डाली गई। इनमें जीएसपीसी, ओएनजीसी, अडानी गैस जो दो परिप्रेक्ष्य पर आधारित है। इसके अलावा भारतीय गैस उद्योग के लिए मौके और भारतीय गैस उद्योग के विकास की चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। सिरकर ने कहा, “हम अपनी अर्थव्यवस्था को गैस पर आधारित बनाना चाहते हैं। हमारे पास एक महत्वाकांक्षी योजना है जो 6.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की भारी वृद्धि के लिए है। गैस का उपयोग तकरीबन सभी क्षेत्र में होता है वह चाहे पवर हो या सीजीडी या उर्वरक। हालांकि, हमारे देश में जो अहम चुनौतियां हैं वह पूर्वी भारत में पर्याप्त गैस आपूर्ति की चुनौती है जबकि प्राकृतिक गैस की कीमत अभी भी एक चुनौती है।”
Wednesday, December 26, 2018
जीरो मूवी रिव्यू
जीरो मूवी अपने नाम के मुताबिक है। इसकी कहानी बउआ नाम के एक बौने किरदार के आसपास घूमती है, जो कि मेरठ का रहने वाला है। बउआ ( शाहरुख़ खान ) को आफिया ( अनुष्का ) नाम की लड़की से प्यार हो जाता है जो कि वैज्ञानिक रहती है और सेरीब्रल पाल्सी नामक रोग से पीड़ित रहती है. दोनों में आसमान ज़मीन सा फर्क है , इसके बाबजूद दोनों की प्रेम कहानी भारत की ज़मीन से उठकर अमेरिका के अंतरिक्ष तक जा पहुंचती है। मूवी में इन दोनों के प्यार के सफरनामे को अलग तरीके से दिखाया गया है. फिल्म में कैटरीना कैफ ( बबीता ) भी है जो नशे में धुत होने के बाबजूद मोम की गुडिया लगी हैं लेकिन उनके पास दर्शको को लुभाने जैसा कोई अहम् भूमिका नहीं थी। इसके साथ ही फिल्म में कई सहकलाकार भी जान डाले हुए हैं।
इस फिल्म की कहानी को हिमांशु शर्मा ने लिखा है और इसका संगीत अजय अतुल ने दिया है.
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अनूठा प्यार |
शाहरुख़ ने जहाँ फैन मूवी की याद ताज़ा की है वही अनुष्का ने वर्फी मूवी में प्रियंका चोपड़ा जोनस के अभिनय की याद दिलाई। काफी कोशिश की अनुष्का ने अपने किरदार को जीवंत करने की जो कि सराहनीय है लेकिन अगर प्रियंका से तुलना की जाये तो फीका रहा उनका किरदार। इस फिल्म में शाहरुख़ ३८ साल के युवा हैं जो अब तक कुंवारे हैं , माँ बाप के साथ रहने की वजह से उन्हें कभी पैसो की दिक्कत नहीं हुई , वरन छोटे से शहर में ३८ साल का कुंवारा लड़का शायद ही मिलता हैं , लेकिन बउआ का कम कद का होना भी एक वजह है जल्दी शादी का न होना।
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बबीता कुमारी का अविश्वसनीय किस बउआ को |
अनुष्का के एक डायलॉग ने दिल छू लिया की रिश्ता और प्यार बराबर में चलता है , मुझे भी इस अवस्था में कोई सही आदमी नहीं मिलने वाला और तुझे भी बौने के रूप में कोई प्यार नहीं कर सकता। बउआ का बौनापन यहाँ मजबूत पक्ष लेकर उभरा वरन आफिया जैसी सुन्दर और होनहार वैज्ञानिक के साथ रिश्ता तय हो जाना , ठीक वैसा ही है जैसे कहानियो में परियां मिल जाती है। इस बीच कहानी का रुख कैटरीना कैफ ( बबीता कुमारी ) की तरफ चला जाता है। बबीता का क्या किरदार है ? बउआ को आफिया का प्यार ज़मीन में मिलेगा या अंतरिक्ष में इसके लिए आपको सिनेमा हॉल जाना होगा । मूवी में मनोरंजन और अच्छा संगीत का मिश्रण है जो कि आपको बोरियत महसूस नहीं होने देगा। कुल मिला के ये मूवी थोड़ा सा अलग हटके है प्यार के अलग साइड इफेक्ट्स और अलग वादे को पुरी करती नज़र आएगी। ज़ीरो का अंत आखिर ज़ीरो में ही हुआ लेकिन बउआ सिंह का कद काफी बड़ा हो गया फिल्म के अंत में। इस कहानी को मैं ५ में से ३ *** रेटिंग देना चाहूंगी।
Tuesday, December 11, 2018
उर्जित का त्यागपत्र - अर्थजगत को झटका
उर्जित रवींद्र पटेल किसी परिचय के मोहताज नहीं , अर्थशास्त्र जगत में उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त है।इनका जन्म केन्या के नैरोबी( राजधानी ) में हुआ था। भारतीय रिजर्व बैंक के २४ वे गवर्नर बनने से पहले उर्जित आर पटेल केंद्रीय बैंक के डिप्टी गवर्नर थे। ४ सितम्बर २०१६ को इन्हे भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर बनाया गया था । अचानक हुए नोटबंदी के निर्णय को भी पटेल जी ने बखूबी निभाया। उनकी और उनकी टीम की सुदृढ़ व्यवस्था अर्थशास्त्र के लिए एक बड़ी उपलब्धि है। पटेल ने अपने सूझ बुझ से मुद्रा स्फीर्ति को स्थिर बना कर रखा था. अभी पटेल जी का कार्यकाल पूरा होने में ८ महीने बाँकी थे तो अचानक से इस्तीफा दे देना , सरकार और अर्थजगत के लिए एक झटका है। इससे कहीं न कहीं अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। सरकार त्वरित निर्णय नहीं ले सकती कि अगला गवर्नर किसे बनाया जाये। हलाँकि अगर पटेल के कथानुसार सोचा जाये तो उन्होंने इस्तीफा देना व्यक्तिगत मामला बताया है। लेकिन ये पूरी तरह से सच नहीं है , आर बी आई और सरकार में लगातार किसी बात को लेकर खींच तान चल रही थी , लम्बे खींच तान के बाद पटेल जी ने समझौता न करके इस्तीफ़ा का रास्ता इखतियार कर लिया। आर बी आई की स्वायत्तता और कमजोर बैंकों के प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन फ्रेमवर्क में रखना जैसे मुद्दों को लेकर सरकार और आर बी आई में तकरार चल रही थी। अभी चुनावी माहौल में राजनीति सरगर्मियां तेज हो रही हैं। इधर पटेल जी का इस्तीफ़ा और दुसरा एग्जिट पोल के नतीजे से सरकार और बाजार को दोहरी मार पड़ सकती है.
कुछ अहम् मुद्दे थे संप्रग सरकार और आर बी आई के बीच जिसे पटेल ने सरकार के सामने रखा था
१. कृषि ऋण माफ़ी योजना
२ भारत में बैंकिंग को बैंकिंग सवामित्व अधिकार न होना
३ मौद्रिक दरों में उतार चढाव
इन मुद्दों के अलावा भी कई ऐसे मुद्दे थे जो टकराव का कारण बने बिना निष्कर्ष निकले।
जैसे आर बी आई प्रशासनिक सुधार , भुगतान प्रणाली के लिए मानक , आर्थिक पूंजी का ढांचा ,नियामकीय पूंजी मानक और पीएसबी बोर्डों पर आर बी आई का चयन।
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उर्जित रवींद्र पटेल |
आर बी आई गवर्नर एक गरिमामयी पद है और इसकी नियुक्ति सरकार करती है।
सूत्रों की माने तो पटेल जी ने अपने आर बीआई के केंद्रीय निदेशक मंत्रिमंडल के निदेशकों का आभार जताया लेकिन सरकार को उन्होंने अनदेखा कर दिया। इससे साफ़ हो गया की इस्तीफे का कारण सिर्फ व्यक्तिगत नहीं है।
लेकिन वहीँ प्रधानमंत्री मोदी जी और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने आश्चर्य जताया तो साथ ही साथ उन्होंने उनके कार्य - कुशलता की सराहना भी की।
अब देखना ये होगा की पटेल की जगह कौन लेता है।
Monday, December 10, 2018
ये इश्क़ नहीं आसां बस इतना समझ लीजिये
मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा कि मुझे आपकी लेखनी से इश्क़ हो गया है , क्या आप इश्क़ पर कुछ लिख सकती हैं ? मैं मन ही मन मुस्कुराई और अपने आप से बातें करने लगी कि अगर हमने इश्क पर कुछ न लिखा तो क्या लिखा। हलाँकि इस विषय पर लिखने की न मेरी उंगलियों में ताकत है और न ही मेरे जेहन में लैला और शीरीं जैसे ज़ज्बात भरे हुए हैं। फिर भी प्रेम को समझने की एक छोटी सी कोशिश होगी मेरी ।
यूँ तो प्रेम की परिभाषा अलग अलग होती है , सभी की अपनी अपनी राय हो सकती है। प्रेम का ही वृहद् रूप इश्क़ या मुहब्बत होता है. नाम चाहे हज़ारो हो किन्तु प्रेम में केवल प्यार ही प्यार होता है. अब सवाल उठता है की प्रेम है क्या ? क्यों होता है ये प्रेम ? क्या सभी प्रेम एक जैसे होते हैं ? तो आइये हम प्रेम के बारे में जानते हैं कि प्रेम क्या है :
प्रेम एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जो की आमूमन किसी के भी प्रति पैदा हो सकता। हम यहाँ माँ -बेटे , भाई - बहन , गुरु- शिष्य के बीच के प्रेम की बातें नहीं कर रहे हैं, यहाँ तक की पति- पत्नी का भी प्रेम अलग होता है। ये सारे बंधन वाले प्रेम हैं।
हम बात कर रहे हैं उस प्रेम की जो कोई प्रेमी अपने प्रेयसी से करता है , और उसकी प्रेमिका अपने प्रेमी से करती है। कुछ लोग सोचते हैं कि हम प्यार में कुछ पा लेते है लेकिन नहीं, सच्चे और निश्छल प्रेम में इंसान खुद को खो देता है ठीक वैसे ही जैसे प्रभु की भक्ति में वो खुद को खोता है।
प्रेम का मतलब ही है विलीन हो जाना एक दूसरे में अर्थात मैं न होकर हम हो जाना। यहाँ मैं से हम का मतलब मेरा दैहिक रूप से नहीं है बल्कि उस आत्मा से है जिसे आपको अंगीकार करना है। प्रेम एक तरह से साधना मात्र है , लेकिन बेहद अफ़सोस की आज हर गली कुची में आपको लोग मिल जायेंगे ये कहते हुए कि वो प्रेम में हैं , जबकि वो प्रेम में नहीं हवा के उस बहाव में जहाँ से हम सभी होकर गुजरते हैं अपने जीवन काल में. कुछ लोग अपने जैवकीय (बायोलॉजिकल ) गुणों से मजबूर , कुछ लोग अपने शरीर में होने वाले रासायनिक सन्तुलन (केमिकल बैलेंस ) बिगड़ने से मजबूर तो कुछ आज के बदलते परिवेश से मजबूर। प्रेम मात्र बाह्य आकर्षण नहीं है। स्त्री और पुरुष में सिर्फ बाह्य आकर्षण क्षणिक हो सकता है , लेकिन आत्मा का प्रेम अन्नत हो जाता है। साधारण व्यक्ति के लिए प्रेम को जान पाना उतना ही कठिन है जितना की अँधेरे में किसी चिराग को ढूंढने की कोशिश करना।
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प्रेम एक साधना |
प्रेम में खुद को हारना पडता है , और वहां वो हार भी आपको जीत का एहसास कराते हैं. हारने का अर्थ अपने अहम् को अपने मैं से है, न की बहार की कोई हार से। फिर देखिये कुछ अनछुए पहलु कैसे छुए पहलुओं में तब्दील हो जाता है.
अचानक ही मुझे कुछ पंक्तिया याद आ गयी जिसने भी लिखा है बिल्कुल ही सही लिखा है
" दर्द दिलो के कम हो जाते अगर मैं और तुम हम हो जाते "
आपने शायद पहले भी सुना ही होगा की जबतक हीर खुद को राँझा न समझे और राँझा खुद को हीर तबतक वो सही मायने में इश्क़ है ही नहीं।
" राँझा राँझा करदी वे , मैं आप राँझा होई "
प्रेम इतना सुन्दर होते हुए भी दुःख भरा होता है अक्सर , जो रिश्ते जान से प्यारा होता है कल को बेगाना सा हो जाता है दुखों का सैलाब हमारे सामने होता है। फिर हम उस प्रेम को कोसने लगते हैं की क्यों हुआ था हमे प्रेम ?
कभी लोग मरने की सोचते हैं तो कभी अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन मैं कहती हूँ आपसे की आप अगर वो प्यार के खुशनुमे पल याद करेंगे तो आपका प्यार आपको आंसू तो देगा लेकिन उसमे एक खुशी भी महसूस होगी।
याद कीजिये प्रेम का वो पल जब आप उसके या उसकी बातो पर अकेले अकेले मुस्कुरा उठते थे , जब उनकी उँगलियों की पोरे आपके सर पर हाथ फेरती थी तो आपको वो एहसास होता था की दुनियां में गम के बादल ने आपको घेरा ही नहीं है। जबकि ये मात्र एक एहसास था उस वक्त भी और आज भी। परेशानियां तब भी थी आज भी है और कल भी रहेंगी। प्यार न सही जीवन में प्यार के एहसास को महसूस करके ही रोमांचित हो जाइये ताकि फिर से जीने की तम्मना जाग उठे और कुछ कर गुजरने की। ... प्रेम में एक समर्पण होना चाहिए जैसे ईश्वर को आपने कोई वस्तु अर्पित की हो। अगर आपका प्रेम सच्चा और सहृदय वाला होगा तो देर से ही सही आपके प्रेम को सफलता मिलती है.
वहीँ प्रेम का दूसरा पहलु अगर हम देखे तो पाते है की प्रेम सफल होकर भी विफल हो गया। लेकिन मेरे हिसाब से अगर प्रेम दो आत्माओ का मिलन है तो हमेशा सफल है और अमर है। शारीरिक प्रेम आपको पल भर के लिए पूर्णता का एहसास करा सकता है किन्तु वो सही मायने में प्रेम नहीं है। अगर ऐसा होता तो सबसे ज्यादा प्रेम पति और पत्नी के रिश्तों में होना चाहिए था। पति - पत्नी जीवनसाथी होते हैं उसमे एक बंधन होता है एक स्वार्थ निहित प्रेम होता है कही न कही , जबकि प्रेम मुक्ति का मार्ग है जो की हमे पशु से थोड़ा अलग बनाता है एक सच्चा इंसान.. बनाता है आपको। बंधन वाला प्रेम होकर भी जो बंधन रहित हो वही प्रेम है। प्रेम में बस ऐसे ही हादसे होते है की फिर हम कोई अरमान न कर सके , लेकिन जो भी हो पल चाहे खुशी के हो या गम के प्रेम में पलके भीगी ही होती है।
फिर भी ये दिल यही कहता है कि " काँटों से खींच के ये आँचल बंधन ये प्यार का , कि आज फिर जीने की तम्मना है मरने का इरादा है कि तुमसे एक वादा है।
प्रेम का विषय इतना गहरा है की एक पोस्ट में उसे लिखा या समझा नहीं जा सकता।
Friday, December 7, 2018
सर्दियों में भी पाएँ दमकती त्वचा
सर्दियाँ शुरू होते ही हमारी त्वचा बेजान और रूखी होने लगती हैं। यूँ तो हर मौसम में त्वचा की देखभाल करनी चाहिए , पर सर्दियों में हमें त्वचा का ज्यादा ध्यान रखना होता है ताकि हमारी त्वचा हरदम खिली - खिली नज़र आये। इस मौसम में तैलीय (ऑयली ) त्वचा वालो को थोड़ा रहत मिल जाता है पर इसका मतलब ये कतई नहीं है कि उन्हें अपने त्वचा पर ध्यान देने की जरुरत नहीं होती है. सर्दियों में कुछ लोग पानी पीना कम कर देते हैं, पानी की कमी से त्वचा अधिक रूखी होने लगती है।
इस मौसम में बेहतर लोशन और कोल्ड क्रीम के अलावा कुछ घरेलु उपाय भी बेहद कारगर साबित होता है , खुश्की दूर करने के लिए। आइये हम आपको कुछ टिप्स बता रहे हैं जिससे आपकी त्वचा सर्दियों में भी दमकती हुई नज़र आएगी।
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सर्दियों में भी खिली खिली रहे त्वचा |
१ सुबह नहाने के लिए गरम और अधिक ठंढे पानी की जगह आप गुनगुने पानी का उपयोग कर सकते हैं ,साथ ही साथ त्वचा में अधिक नमी बनाये रखने के लिए इसमें तेल ( सरसो या नारियल) की कुछ बुँदे भी मिला सकते हैं ।
२ चेहरा धोने के लिए किसी मृदुल फेस वाश (माइल्ड फेस वाश) का उपयोग कर सकते हैं या मलाई में पांच बून्द नींबू मिलाकर साफ़ कर सकते हैं ,मलाई से जहाँ आपके चेहरे की नमी बनी रहेगी वहीँ नींबू से आपके रोमछिद्र (पोर) साफ़ होंगे।
३. अगर आपकी त्वचा ज्यादा रूखी है तो आप शहद , हल्दी और दो बून्द नीम्बू का इस्तेमाल कर सकते हैं , नीम्बू की अधिक मात्रा आपकी त्वचा को रूखी कर सकता है , वहीँ शहद त्वचा को नर्म और मुलायम बनाता जबकि हल्दी आपकी त्वचा में निखार लाने का काम करता है.
४ इस मौसम में स्क्रब और मुलतानी मिट्टी का उपयोग न के बराबर करे क्योंकि ये आपकी त्वचा को रूखी कर सकतें हैं।
५ नहाने के बाद आप ऑलिव आयल और क्रीम बेस्ड मॉइस्चराइजर लगा सकते हैं ताकि आपकी त्वचा में दिन भर नमी बरकरार रहे।
६ इस मौसम में चेहरे के साथ साथ होठ और एडियों का भी खास ख्याल रखे , इसके लिए सोते समय होठों पर घी या मलाई से मसाज करें और एडियों को साफ़ करके वैसलीन लगाकर जुराबें पहन लें.
७ सबसे खास बात चाय और काफी का सेवन कम करे ताकि हमारा शरीर डिहाइड्रेट न हो
उम्मीद है आपको ये पोस्ट पसंद आया होगा।
Thursday, December 6, 2018
परिवहन का उपहार मेट्रो मेरी जान
सवर्गीय मदन लाल खुराना जी की देन मानते हैं इसे। देन किसी की भी हो लेकिन आज मेट्रो दिल्ली और दिल्ली वालो की जान है । एनसीआर में घनी आबादी को पलायन करते देखते हुए मेट्रो का विस्तार दिन व् दिन तेज होता जा रहा है. लगातार ट्रैफिक की मार और समय की कमी को ध्यान में रखते हुए कार्यालय जाने वालों के लिए ये वरदान के समान है. आइये कुछ मेट्रो यात्रियों से जानते हैं कि मेट्रो कितना फायदेमंद है दिल्ली और दिल्ली एन सी आर वासियो के लिए।
अंजु - जो कि दिल्ली से गुड़गांव जाती है उनका कहना है कि अगर समय और ट्रैफिक के हिसाब से देखा जाए तो मेट्रो बेहतर है लेकिन वही दूसरी ओर बेतहाशा भीड़ में खड़े होने की गुंजाईश नहीं होती है सही से, क्यूंकि लगभग लोगो के कार्यालय जाने - आने का टाइम एक ही होता है।
दूसरे यात्री नॉएडा के अभिषेक से हमने इस सन्दर्भ में बातचीत की जिनके रिश्तेदार जनकपूरी में रहते हैं कि वो मेट्रो के बारे में क्या विचार रखते हैं ? -
अभिषेक - जी वैसे तो मेट्रो बहुत ही सुविधाजनक है हर दृष्टिकोण से लेकिन अचानक इसके भाड़े में इजाफा होना लोगो की जेब पर असर कर रहा है। वैसे हमें कम परेशानी है क्यूंकि मैं अपने रिश्तेदार के यहाँ कभी- कभी जाता हूँ लेकिन वही रोज सफर करने वाले यात्री से अगर पूछेंगे तो वो परेशान है।
अब दो लोगो से बातचीत करने के बाद यही अंदाजा लग रहा की मेट्रो भीड़ और अधिक भाड़े की मार यात्रियों को दे रहा है.
वही दूसरी ओर मेट्रो के एक वरिष्ठ कर्मचारी का कहना है कि मेट्रो के भाड़े में वृद्धि होने के वावजूद अभी भी सबसे सस्ती और सुविधाजनक यात्रा है , इसमें लोगो को वातानुकूलित सुविधा भी मिलती है।
हमारी सोच में मेट्रो की स्थिति को और सुदृढ़ करने के लिए भीड़ पर नियंत्रण के लिए एक सही वयवस्था होनी चाहिए साथ ही मुल्य वृद्धि एक साथ न करके एक समय सीमा अंतराल में बढ़ाना चाहिए ताकि मेट्रो के प्रति लोगो को रुझान बना रहे।
Wednesday, December 5, 2018
बराबरी का तानाबाना
हम मतलब बराबर कितना सही कितना गलत ---
स्त्री हो या पुरुष दोनों में समानता होनी चाहिए ये मैं इसलिए नहीं कह रही क्यूंकि मैं खुद एक स्त्री हुँ।
मेरा पोस्ट उनलोगो और समाज की कुत्सित मानसिकता को समर्पित है जिन्होंने बराबरी के मतलब का हक़ गलत समझ लिया है. आखिर हम दोनों ही इस सृष्टि की बेहतरीन रचनाएँ हैं तो फिर महिलाओं के साथ ज्यादती क्यों ??? हमे पता है इसका जवाब हममे से किसी एक के पास नहीं होगा लेकिन मुझे मालूम है कि अगर हम इसका जवाब तलाशे तो हमे अपने अंदर ही जवाब मिल जायेगा।
तो आइये इसका पता करते हैं कि इस गलत मानसिकता की शुरुवात कहाँ से हुई। खुद हमारे घर से ही इसकी शुरुवात होती है. हम भाई बहन साथ बड़े होते हैं लेकिन पक्षपात वहीँ से शुरू हो जाता है। बचपन से ही पुरूषवादी सोच समाज में हावी हो जाता है। जैसा की हम सभी जानते हैं की भारत गावों का देश है तो हमे कोई भी आंकड़े उस हिसाब से ही लेना होगा न की शहरी जीवन से। अभी भी कई ऐसे जगह हैं जहाँ लड़कियों को सिर्फ इसलिए शिक्षित करने से लोग डरते है की कहीं ये भी अपने भाई की तरह बराबरी का हक़ न मांगने लगे। मैं मानती हूँ कि लड़कियां शारीरिक रूप से कोमल होती है लेकिन उन्हें अपंगु बनाने में हम स्व्यं जिम्मेदार हैं.
आये दिन महिला सशक्तिकरण की बातें सुनने को मिलती है लेकिन ये तबतक संभव नहीं जबतक बराबरी का का हक़ नहीं मिलेगा। बेटे और बेटी को अगर हम समान रूप से सबल बनाते हैं तो वो न केवल अपने ज़िंंदगी के लिए सही फैसला लेंगी बल्कि उनके मन में विद्रोही स्वभाव भी नहीं पैदा होगा न ही वो गलत फैसला लेंगी भविष्य में। क्यूंकि आपके घर से निकल कर उसे एक नया घर भी बसाना होता है फिर से वह बराबरी की लड़ाई अपने पति के साथ लड़ेगी। सवाल ये नहीं है कि लड़किया ज्यादा पढ़ लिखकर विद्रोह करती हैं वो बस बराबरी का सम्मान खोजती है अपनों से ताकि वो खुद को उपेक्षित न समझे। अगर पहले भी महिलाओ को अपने अधिकारों का पता होता तो वो आवाज़ उठा सकती थी लेकिन उन्हें पता था कि घर के बाहर की जिम्मेदारी मेरे पति की है और मेरी दुनियाँ इस चारदीवारी तक ही सिमित है।
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भाई बहन = |
पति और पत्नी =
हालाँकि आज २१वीं सदी में जब हम हैं तो लोगो की सोच में थोड़ा सा बदलाव आया पर ये किंचित मात्र ही है अब भी। महिलाओं ने चारदीवारी से कदम क्या बढाये , हवा को झरोखे की बजाय दरवाजे खोल के महसूस क्या किया समाज में उथल पुथल शुरू हो गयी , ये लड़की लड़को की बराबरी करती है. अगर लड़की अपने कंधे पे जिम्मेदारी का बोझ उठा सकती है तो वो आर्थिक मसलो पर भी विचार कर सकती है अपने पति के साथ मिलकर। एक लड़की अगर अपने पिता का ख्याल शादी से पहले रख सकती है तो ठीक उसी प्रकार शादी के बाद भी कर सकती है। लेकिन हमने खुद ये समाज में भ्रांतिया फैला रखी है की नहीं लड़की पराया धन है। बेहद अफ़सोस जब उसे जन्म देकर हम खुद ही पराये कहते हैं तो उस पराये घर में उसका क्या सम्मान होगा।मुझे उम्मीद है कि वो दिन जरूर आएगा जब महिलाओं के समान अधिकार की बात घर से ही शुरू होगी। अगर महिला बाहरी कामों में सहयोग कर रही है तो पुरुष को भी बिना सोचे समझे घर के कामों में हाथ बंटाना चाहिये। इससे दोनों को फ़ायदे होंगे महिला भी पुरुष का क़द्र करेंगी की पैसा कमाना इतना आसान नहीं और पुरुष भी महिला का क़द्र करेंगे की घर में भी बहुत सारे काम होते हैं जिनको व्यवस्थित करना इतना आसान नहीं है। यकीन मानिये रिश्तो में दोस्ती और सम्मान प्यार से ज्यादा महत्त्व रखते हैं। उम्मीद है मेरा ये पोस्ट सबको सही लगा हो ,बस अपना नजरिया बदल ले आज से। साथ ही साथ मैं अपने भाई , दोस्तों और सम्मानीय जनों से अनुरोध करती हूँ कि हमारे इस पोस्ट को अन्यथा न ले बस अपनी सोच में थोड़ा सा बदलाव लाकर एक बेहतर और सुद्दृढ समाज का निर्माण करने में हमारा सहयोग करे। आपके व्यंग को सहर्ष स्वीकार करुँगी और सुझाव को भी।
Tuesday, December 4, 2018
हिंदी भाषा की गरिमा
हिंदी भाषा से मेरा जुड़ाव मेरे मन को हमेशा उद्वेलित करता रहा की मैं अपनी बात लोगो के समक्ष रख सकूँ। और शायद यही वजह है की मैं आपलोगो के सामने हिंदी में ब्लॉग लिखने का प्रयास कर रही हुँ।
यह बताने की शायद ही जरुरत होगी की हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। मैं अंग्रेजी के खिलाफ नहीं हूँ बेशक हमे अंग्रेजी का ज्ञान होना चाहिए क्यूंकि आज विकास के सारे मार्ग अंग्रेजी ने बांध रखे है। कम अंग्रेजी आना आज के युग में हीन भावना की ओर ले जाता है व्यक्ति को , लेकिन अपनी भाषा हिंदी की क्या दशा हो रही है ये किसी से छुपा नहीं है. कई बार बड़ा आश्चर्य होता है और दुःख भी होता जब लोग कहते हैं हमे हिंदी नहीं आती.. .एक ओर जहाँ हम ये कहते नहीं थकते हिंदी हैं हम हिंदी है वतन हमारा , वहीँ दूसरी ओर हिंदी की उपेक्षा की जाती है। हलांकि हमारे देश में हिंदी कवियों एवं लेखकों ने अपना वर्चस्व कायम रखा है। लेकिन जितना सम्मान हिंदी भाषा को मिलना चाहिए वो नहीं मिल पा रहा। तो आखिर इसका जिम्मेदार कौन है जो हमे अपनी भाषा से दूर ले जा रहा है। इसका जबाब अगर हम खुद में ढूंढेंगे तो मिल जायेगा , अंग्रेजी सीखने की दीवानगी कहीं न कहीं हमे हिंदी से बहुत दूर ले आया है। अँग्रेजी हमारी जरुरत हो सकती है परन्तु हिंदी हमारी मातृभाषा है , और अपनी मातृभाषा का सम्मान और उसकी सही जानकारी अपने आप में गौरव की बात है। हिंदी न ही सिर्फ एक भाषा है बल्कि आपके मन की बात को कहने का एक बेहतरीन ज़रिया है।
मैं भी पत्रकारिता से सरोकार रखती हूँ। अंग्रेजी सीखने की कोशिश करती हूँ हमेशा लेकिन अपनी भाषा का तहेदिल से सम्मान करती हूँ। साथ ही साथ मैं हिंदी पत्रकारिता को ध्न्यवाद कहना चाहूँगी जिसने हिंदी को एक नया आयाम दिया है. एक भारतीय बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए हिंदी भी उतना ही जरुरी होना चाहिये जितना की अँग्रेजी भाषा। हिंदी एक गरिमामयी भाषा है इस लिहाज से इसकी वर्तनी और लेखनी में शुद्धता उतना ही जरुरी है जितना की एक माँ का सम्मान। हमने कभी नहीं सुना आजतक की वो हिंदी व्याकरण सीख रहा है जबकि दुसरी भाषा को सीखने की हम सब में दीवानगी होती है , क्योकि वो हमे रोजगार देता है। लेकिन सवाल उठता है की हम खुद अपनी मातृभाषा का तिरस्कार करेंगे तो दूसरे कबतक सम्मान करेंगे। अतः आप सबसे आग्रह है अपने बच्चो को चाहे जहाँ भी शिक्षा के लिए भेजे पर अपनी भाषा को समझने के लिए उन्हें प्रेरित करें। हिंदी दिवस एक दिन मनाने की जगह हर दिन हिंदी का होना चाहिए , क्योंकि सम्पूर्ण भारतवर्ष को एक करने वाली ये अकेली मात्र भाषा है। इसके साथ ही मैं अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी। हमारे लेखन पर आपके व्यंगों को भी मैं तहेदिल से स्वीकार करुँगी।
Monday, December 3, 2018
सफलता बनाम असफलता
सफलता बनाम असफलता
अक्सर देखा जाता है कि जल्दी सफलता पाने की होड़ में हम अपने यथार्थ से काफी दूर भाग जाते हैं।
सफलता के लिए निरंतरता बहुत ही जरुरी होता है। अक्सर हम सफल व्यक्तित्व को देख के प्रभावित हो जाते हैं कि काश उस जगह हम होते। लेकिन हम अगर उन महान सख्शियत के बारे में भी चर्चा करेंगे तो हमे यही पता चलेगा कि लगातार असफलता और उनके अथक प्रयास ने ही उनके सफलता में अहम् भूमिका निभाई है।
इस संसार में शायद ही कोई व्यक्ति हो जो ऊँचा न उठना चाहता हो। तो क्या सिर्फ हमारी सोच हमे उस जगह ले जा सकती है जहाँ हम जाना चाहते हैं।
ख़वाईशो का दायरा तो किसी का भी बड़ा हो सकता है पर उन्हें सच में तब्दील करना ही असल में सफलता है. कुछ ऐसे ही हम अपने बच्चो के लिए भी सपने संजो लेते हैं। एक ओर जहाँ हम बच्चो के सुखद भविष्य की कामना करते हैं तो दूसरी ओर उनसे जरुरत से ज्यादा अपेक्षाएँ भी रख लेते हैं। हम ये तक भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की काबिलियत अलग अलग होती है वरन आज इतने रोज़गार के मौके नहीं होते।
अब सवाल उठता है कि हम ऐसा क्या करें जिससे हम और हमारे बच्चे एक बेहतर कल का निर्माण कर सके।
1 सबसे पहले अपने बच्चे में ये भावना विकसित करे कि मैं कर सकता हूँ।
2 दूसरी बात उनकी रूचि जाने की वो बेहतर क्या कर सकते हैं।
३ वो अपनी ज़िन्दगी को किस नजरिये से देखते हैं
4. अपने बच्चो से खुल कर बात करें की वो जिस करियर को चुनने जा रहे हैं उसमें संभावनायें कितनी है और कितने प्रयास की उन्हें जरुरत है ताकि वो समय रहते ही अपने चुने हुए करियर पर पुनर्विचार कर सके।
5 . अपने बच्चो से दोस्ताना व्यवहार रखे और उनसे नियमित और निरंतरता जैसे शब्दों पर बात करें।
6 .सबसे अहम् है ये जांचे कि कही समय प्रवंधन में तो आपका बच्चा नहीं पिछड़ रहा ,यदि ऐसा है तो उन्हें उत्साहित करने वाली किताबे थोड़ी देर पढ़ने को कहे क्योकि हमारे दवारा बोले गए शब्द बच्चे को कई बार बुरे लग सकते हैं लेकिन किताबो में वही बाते पढ़ के उन्हें सीख मिलती है साथ ही साथ वे प्रभावित भी होते हैं।
आखिरी लेकिन सबसे जरुरी बात की अपने बच्चो की सँगति पर गौर करे. इन सब बातो का ध्यान रख कर हम अपने बच्चो के सपनो के साथ खुद के सपने साकार होते हुए भी देख सकते हैं।
क्योंकि हम अगर आज हैं तो हमारे बच्चे हमारा और इस देश का कल है। तो क्यों न एक बेहतर कल की नींव आज ही रखी जाये।
Saturday, December 1, 2018
अटल बिहारी वाजपेयी का सियासी सफर...
राष्ट्रीय राजनीति में अटल का सियासी सफर 1951 से शुरू हुआ। जब वह भारतीय जनसंघ के संस्थापक सदस्य बने। अपनी कुशल वक्तव्य श्ौली से उन्होंने राजनीति के शुरूआती दिनों में ही अपना प्रभाव छोड़ना शुरू कर दिया था। अपनी बेजोड़ वाणी और उसके उपयोग की कला में महारत हासिल रखने की वजह से उन्होंने न केवल संसद के अंदर, बल्कि बाहर भी खूब रंग जमाया। उनकी भाषण-श्ौली के प्रशंसक देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू भी रहे।
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| Atal ji |
सांसद से पीएम तक...
-अटल बिहारी वाजपेयी कुछ 9 बार लोकसभा के लिए चुने गए थ्ो। दूसरी लोकसभा से तेरहवीं लोकसभा तक, बीच में कुछ लोकसभाओं से उनकी अनुपस्थिति भी रही, जब वह 1984 में ग्वालियर में कांग्रेस नेता माधव राव सिंधिया के खिलाफ चुनाव हार गए थ्ो। श्री वाजपेयी 1962 से 1967 और 1986 में वह राज्यसभा के सदस्य भी रहे।
-16 मई 1996 को वह पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने, लेकिन दुर्भाग्यवश लोकसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाने की वजह से उन्हें 31 मई 1996 को त्यागपत्र देना पड़ा। इसके बाद 1998 तक वह लोकसभा में विपक्ष के नेता रहे। 1998 के आम चुनावों में सहयोगी पार्टियों के साथ उन्होंने लोकसभा में अपने गठबंधन का बहुमत सिद्ध किया, लेकिन इस बार भी वह महज 13 महीने ही देश के प्रधानमंत्री रह सके, क्योंकि एआईएडीएमके द्बारा गंठबंधन से समर्थन वापस लिए जाने की वजह से उनकी सरकार गिर गई थी। इसके बाद 1999 में आम चुनाव हुए। यह चुनाव राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझा घोषणा-पत्र पर लड़े गए और इन चुनावों में वाजपेयी के नेतृत्व को एक प्रमुख मुद्दा बनाया गया। गठबंधन को बहुमत हासिल हुआ और वाजपेयी तीसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। वह मई, 2००4 तक देश के प्रधानमंत्री रहे।
- अटल बिहारी वाजपेयी को सांसद के रूप में लगभग चार दशक का अनुभव रहा, जबकि राजनीति में उन्होंने 5० साल से भी अधिक का समय खपाया। जब वह पहली बार सांसद बनकर आए तो पंडित जवाहरलाल नेहरू से काफी प्रभावित हुए। पंडित नेहरू से उन्हें प्रतिभाशाली सांसद बताया और कहा कि यह आगे चलकर देश का प्रधानमंत्री बनेगा। संसद सदस्य के रूप में चार दशक के सफर में वह पांचवीं, छठवीं, सातवीं, और फिर दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं और तेरहवीं लोकसभा के सदस्य रहे। जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ जनांदोलन छेड़ा गया, तब आपातकाल के दौरान 1975 से 1977 के बीच श्री अटल बिहारी वाजपेयी को जेल भी जाना पड़ा।
यूएन में हिंदी में दिया भाषण
-श्री अटल बिहारी वाजपेयी द्बारा संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिंदी में दिया गया भाषण न केवल देश के लिए गौरव की बात थी, बल्कि वाजपेयी ने भी इसे अपने लिए सबसे अधिक प्रसन्नतापूर्वक क्षण मानते रहे। वाजपेयी का वह भाषण ऐतिहासिक था। संयुक्त राष्ट्र महासभा में ये पहली बार हुआ, जब किसी भारतीय ने हिंदी में भाषण दिया।
Friday, November 30, 2018
भूलने की समस्या बढ़ना चिंताजनक
'भूलने का डर’ आज हर किसी की समस्या बन रहा है। यह हमें इस बात के लिए चिंता में डाल रहा है कि आखिर यह डर क्रिएट हो कैसे रहा है। कहां से डर आ रहा है। हम इसकी सच्चाई को समझने के बजाय उसके भंवर में और भी घुसे जा रहे हैं, जिससे यह समस्या और भी बढ़ रही है। हमारे अंदर क्रिएट होने वाला 'भूलने का डर’ किसी और की देन नहीं बल्कि स्वयं हमारी देन है। इसके पीछे हमारे द्बारा स्वयं को तमाम चीजों में उलझाए रखना है। एक वक्त में कई काम निपटाने का दबाव। ये भी करना है, वो भी करना है, यहां भी जाना है, वहां भी जाना है आदि...। क्या एक वक्त में इतने सारे काम संभव हो सकते हैं। हम जानते हैं, ऐसा बिल्कुल भी नहीं हो सकता है। फिर भी हम स्वयं को इतने चीजों में क्यों उलझाकर रखते हैं। इसे समझना बहुत जरूरी है।
लोगों में जो भूलने की समस्या बढ़ रही है, उसमें डिजिटली दुनिया का बड़ा रोल है। हर कोई आज इस दुनिया में खोया रहता है और खोया रहना चाहता है। शारीरिक मेहनत या एक्टीविटी के बजाय आज हम हर चीज डिजिटल संसाधनों के माध्यम से पूरा करना चाहते हैं। हमारे पास अपनों के लिए भले ही वक्त न हो, लेकिन 'डिजिटली दुनिया’ से एक पल को भी हटने को तैयार नहीं रहते हैं। एक होड़ मची पड़ी है, एक-दूसरे से आगे निकलने की, एक-दूसरे से स्वयं को आगे दिखाने की। एक ऐसा जुनून-सा पैदा हो गया है, जो लोगों को इसका आदी बनाता जा रहा है। इस जुनून के बीच हम कितने खतरे मोल ले रहे हैं, इस पर हम गंभीरता से ध्यान नहीं दे पाते हैं। इसमें 'भूलने का डर’ कहें या 'भूलने का खतरा’ कहें, जो सबसे अधिक गहरा रहा है। कई बार तो यह डर सताने लगता है कि हम दूसरों से बहुत पीछे छूट रहे हैं, जीवन की दौड़ में हम पीछे और अकेले रह गए हैं। जो यह 'पीछे छूटने’ व 'अकेले रह जाने’ का डर है वह एक अजीब तरह के 'मानसिक दबाव’ को जन्म देता है। हम जब डिजिटली दुनिया में स्वयं को बांधकर इस डर को कम करने की कोशिश करते हैं तो हम भूल जाते हैं कि हम अपने डर को कम नहीं बल्कि और भी बढ़ा रहे हैं।
अगर, यह याद रख्ों कि जिदंगी 'डिजिटल दुनिया’ में नहीं बल्कि 'अपनों के बीच’ और 'छोटी-छोटी खुशियों’ में होती है तो हमारे अंदर जो भूलने का डर बढ़ रहा है या कहें कि भूलने का जो खतरा बढ़ रहा है, वह कम होगा। डिजीटली दुनिया में स्वयं को बांध्ो रखने का मतलब है कि हम संसाधनों में सुख खोजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अपने अंदर व अपनों के बीच झांककर नहीं देख रहे हैं, जो वाकई वह खुशी है, जिसे हम अपनी प्राकृतिक अवस्था कहते हैं। इस अवस्था को अगर हम गहराई से अंगीकार करें और इस माध्यम को डिजीटली दुनिया में खोए रखने के अनुपात के मुकाबले ज्यादा समय दें तो हमारे अंदर जो भूलने का डर बढ़ रहा है वह कम होता चला जाएगा।
एक जमाना वह हुआ करता था, जब लोग गु्रप में जाना पंसद करते थ्ो। चाहे छोटा काम हो या फिर बड़ा काम, उसमें लोगों की राय और सहमति होती थी, एकजुटता होती थी, लेकिन यह अलग दौर है, जब हम हर किसी चीज का समाधान डिजिटली संसाधनों में खोज रहे हैं। और स्वयं को इतने सारे उलझनों में उलझाए पड़े, जिसका कोई औचित्य नहीं है। यह हमारी प्राकृतिक अवस्था से बिल्कुल ही अलग है। अगर, हम कुछ समय के लिए स्वयं को डिजिटली दुनिया से अलग रखते हैं तो वह क्षण हमें अपने दिमाग को प्राकृतिक अवस्था में रखने में मदद करेगा। चिंतन की जो प्राकृतिक अवस्था होती है, वह मानसिक दृढ़ता को बढ़ाती है। इस दौर में अगर डिजिटली दुनिया से कुछ समस्याओं के समाधान खोजे जाने की आवश्यकता है तो दिमाग को प्राकृतिक अवस्था से सोचने का वक्त देने की भी जरूरत है। अगर, इस तरह से हम अपने जीवन में संतुलन बनाकर रख्ोंगे तो जीवन में अनावश्यक रूप से पैदा होने वाले डर समा’ हो जाएंगे।
मानसून में सेहत के साथी 'फल’
'बारिश’ का सीजन जितना 'रोमांचक’ लगता है, उतना ही मुश्किल भरा भी होता है। 'स्वास्थ्य’ के परिपेक्ष्य में तो और भी मुश्किल, क्योंकि अधिकांश लोगों को यह मौसम 'बीमारियों’ की चपेट में भी ले लेता है। इस मौसम में अगर रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बनाया रखना है तो 'पोषक तत्वों’ से भरपूर खाने के अलावा फलों का निरंतर सेवन भी हेल्दी स्वास्थ्य के लिए बहुत जरूरी होता है। डॉक्टर तो यहां तक बताते हैं कि अगर, इस मौसम में तीन फलों का निरंतर सेवन हो तो वह बहुत ही लाभप्रद है। इसमें 'अमरूद’, 'मौसंबी’ और 'नाशपाती’ जैसे फल शामिल हैं। इन फलों में मौजूद 'पौष्टिक’ और 'एंटी ऑक्सीडेंट’ तत्व न केवल शरीर में ऊर्जा संतुलन के लिए महत्पूण हैं, बल्कि शरीर से 'विषाक्त पदार्थों’ को बाहर निकालने में भी इसकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है। कुल मिलाकर उक्त तीनों फल मानसून में सेहत के बहुत अच्छे साथी होते हैं। आइए इन फलों के सेवन, इनके फायदे और इनको खाने को लेकर सावधानियों के बारे जान लेते हैं।
अमरूद
यह फल कई विमाटिनों से भरा होता है। अगर, मानसून के सीजन में इसका सेवन किया जाए तो यह शरीर के लिए सुरक्षा गार्ड की तरह काम करता है। कई अध्ययनों में यह बात सामने आ चुकी है कि अमरूद में संतरे की तुलना विटामिन-सी और सेब तथा केले की तुलना में पोटेशियम कहीं अधिक मात्रा में पाया जाता है। अमरूद में भरपूर मात्रा में विटामिन ए, विटामिन सी के अलावा बीटामैरोटीन, लाइकोपीन,फोलिक एसिड, पोटेशियम, फाइबर, निकोटिन, आयरन व कैल्शियम जैसे कई पौष्टिक तत्व मिलते हैं। ये शरीर को फिट और स्वस्थ रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इन सब तत्वों से रोग-प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि होती है।
अमरूद के फायदे
अमरूद की पौष्टिकता जानने के बाद अब हम इसके फायदों के बारे में जान लेते हैं। अमरूद दस्त, पेचिश व पेट के कीड़ों के इलाज के लिए बेहद उपयोगी होता है, क्योंकि यह मल त्याग को विनियमित करने और आंतों को ठीक से साफ करने में मदद करता है। भूख में सुधार करता है। अमरूद खाने से अपाचन की समस्या भी दूर हो जाती है। इसका एक महत्वपूर्ण फायदा यह है कि इसका रस फेफड़ों में बलगम बनने से रोकता है और सांस नली के संक्रमण को कम करता है। इसके सेवन इन्फ्लूएंजा वायरस के संक्रमण, डेंगू बुखार की रोकथाम व गले की खराश को दूर करने में सहायक सिद्ध होता है। इसमें मौजूद एस्ट्रीजेंट तत्व त्वचा को स्वस्थ व चमकदार भी बनाता है। इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि अमरूद तत्वा की बनावट में सुधार लाने में भी मदद करता है। मुंहासों, फोड़े-फंसियों व तत्वा संबंधी अन्य विकारों से छुटकारा पाने का यह रामवाण इलाज है।
यह बरतें सावधानी
अमरूद पोषक तत्वों की खान तो है, लेकिन इसके सेवन को लेकर एहतियात बरतने की भी जरूरत होती है। एक दिन में महज दो ही अमरूद खाने चाहिए, क्योंकि जिन पोषक तत्वों की आवश्यकता होती है, वह दो अमरूदों से ही भरपूर मात्रा में मिल जाती है।
मौसंबी
'मौसंबी’ तो वैसे ही सदाबहार फल है, लेकिन मानसून के सीजन में इसका सेवन काफी फायदा देता है। जूझ के तौर पर मौसंबी का सेवन किया जाना चाहिए। खट्टे-मीठे स्वाद वाली मौसंबी का जूझ तो सदियों से चिकित्सीय गुणों के लिए जाना जाता है। इसीलिए इसकी उपयोगी आज भी वैसी-ही बनी हुई है। यह फल भी पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इस फल में विटामिन-सी का भंडार होता है। इसके अलावा विटामिन ए, बी, कॉम्प्लेक्स, फ्लेवोनॉयड, अमीनो एसिड, कैल्शियम, ऑयोडीन, फॉस्फोरस, सोडियम, मैगजीन जैसे पोषक तत्व पाए जाते हैं। एंटीऑक्सीडेंट जैसे गुणों की वजह से मानसून के सीजन में इस फल के सेवन को बहुत अच्छा माना जाता है।
मौसंबी के फायदे
इस फल के सेवन से 'कोलेस्टàाल’ के स्तर और उच्च रक्तचाप में नियंत्रण रहता है, क्योंकि इसमें पोटेशियम, फोलिक एसिड और कैल्शियम की भरपूर मात्रा होती है। इन्हीं तत्वों की वजह से कोलेस्ट्राल और 'उच्च रक्तचाप’ को नियंत्रित करने में मदद मिलती है। चिकित्सकों के अनुसार ये तत्व रक्त कोशिकाओं में इलेक्ट्रोलाइट संतुलन रखने में सहायक होते हैं। पोटेशियम मस्तिष्क में ऑक्सीजन का संचार करता है, जिससे तनाव में राहत मिलती है। इस फल में पाए जाने वाले फ्रक्टोज, डेक्स्ट्रोज जैसे खनिज पदार्थों के पाए जाने की वजह से शरीर में ऊर्जा का संचरण होता रहता है। इससे ह्दय तथा मस्तिष्क को नई ऊर्जा और ताजगी भी मिलती रहती है।
ये बरतें सावधानी
मौसंबी का अधिक सेवन शरीर में कैल्शियम की मात्रा को घटा सकता है। इसकी वजह से हड्डियों और दांतों से संबंधित दिक्कत बढ़ जाती है। इसका अधिक सेवन करने से गले में बलगम भी अधिक मात्रा में बनने लगता है। नाशपाती
मानसून के सीजन में एक और तीसरा महत्वपूर्ण फल है, वह है 'नाशपाती’। नाशपाती का सेवन भी शरीर में ऊर्जा का संचारण भरपूर मात्रा में करता है। इस फल में सेब की तरह ही औषधीय गुण पाए जाते हैं। चिकित्सक बताते हैं कि खनिज, विटामिन्स, एंजाइम और हाइपो-एलज्ॉनिक गुणों के कारण नाशपाती हमारे शरीर में रक्त कॉलेस्ट्रॉल और सेलूलोज के स्तर और मधुमेह को नियंत्रित करता है। नियमित रूप से 'नाशपाती का जूझ’ पीने से आंतों की गड़बड़ी में भी सुधार होता है और यह संक्रामक रोगों से लड़ने की क्षमता भी बढ़ती है। चिकित्सकों के अनुसार सोबिटोल अतिरिक्त फाइबर पाचन प्रणाली को नियंत्रित करने में मदद करता है और कब्ज, दस्त जैसे पेट से संबंधित दिक्कतों को दूर करता है।
फायदे
नाशपाती को सामान्य तरीके से भी खा सकते हैं। इसका जूझ और भी महत्व रखता है, क्योंकि नाशपाती का जूझ प्राकृतिक ऊर्जा का महहत्वपूर्ण स्रोत होता है, जिसमें काफी मात्रा में ग्लूकोज और फ्रक्टोज ऊर्जा में तब्दील हो जाता है। इसके जूझ में शीतलता होती है, जिसकी वजह से शरीर का तापमान नियंत्रित रहता है। इसके सेवन से बुखार, खांसी और कफ को नियंत्रित करने में भी मदद मिलती है।
सावधानी
नाशपाती को अच्छी तरह से धोकर खाए। इसे छिलके समेत सावधानी से चबा-चबाकर खाना चाहिए। यह काफी फायदेमंद होता है।
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