मेरे किसी दोस्त ने मुझसे कहा कि मुझे आपकी लेखनी से इश्क़ हो गया है , क्या आप इश्क़ पर कुछ लिख सकती हैं ? मैं मन ही मन मुस्कुराई और अपने आप से बातें करने लगी कि अगर हमने इश्क पर कुछ न लिखा तो क्या लिखा। हलाँकि इस विषय पर लिखने की न मेरी उंगलियों में ताकत है और न ही मेरे जेहन में लैला और शीरीं जैसे ज़ज्बात भरे हुए हैं। फिर भी प्रेम को समझने की एक छोटी सी कोशिश होगी मेरी ।
यूँ तो प्रेम की परिभाषा अलग अलग होती है , सभी की अपनी अपनी राय हो सकती है। प्रेम का ही वृहद् रूप इश्क़ या मुहब्बत होता है. नाम चाहे हज़ारो हो किन्तु प्रेम में केवल प्यार ही प्यार होता है. अब सवाल उठता है की प्रेम है क्या ? क्यों होता है ये प्रेम ? क्या सभी प्रेम एक जैसे होते हैं ? तो आइये हम प्रेम के बारे में जानते हैं कि प्रेम क्या है :
प्रेम एक नैसर्गिक प्रक्रिया है जो की आमूमन किसी के भी प्रति पैदा हो सकता। हम यहाँ माँ -बेटे , भाई - बहन , गुरु- शिष्य के बीच के प्रेम की बातें नहीं कर रहे हैं, यहाँ तक की पति- पत्नी का भी प्रेम अलग होता है। ये सारे बंधन वाले प्रेम हैं।
हम बात कर रहे हैं उस प्रेम की जो कोई प्रेमी अपने प्रेयसी से करता है , और उसकी प्रेमिका अपने प्रेमी से करती है। कुछ लोग सोचते हैं कि हम प्यार में कुछ पा लेते है लेकिन नहीं, सच्चे और निश्छल प्रेम में इंसान खुद को खो देता है ठीक वैसे ही जैसे प्रभु की भक्ति में वो खुद को खोता है।
प्रेम का मतलब ही है विलीन हो जाना एक दूसरे में अर्थात मैं न होकर हम हो जाना। यहाँ मैं से हम का मतलब मेरा दैहिक रूप से नहीं है बल्कि उस आत्मा से है जिसे आपको अंगीकार करना है। प्रेम एक तरह से साधना मात्र है , लेकिन बेहद अफ़सोस की आज हर गली कुची में आपको लोग मिल जायेंगे ये कहते हुए कि वो प्रेम में हैं , जबकि वो प्रेम में नहीं हवा के उस बहाव में जहाँ से हम सभी होकर गुजरते हैं अपने जीवन काल में. कुछ लोग अपने जैवकीय (बायोलॉजिकल ) गुणों से मजबूर , कुछ लोग अपने शरीर में होने वाले रासायनिक सन्तुलन (केमिकल बैलेंस ) बिगड़ने से मजबूर तो कुछ आज के बदलते परिवेश से मजबूर। प्रेम मात्र बाह्य आकर्षण नहीं है। स्त्री और पुरुष में सिर्फ बाह्य आकर्षण क्षणिक हो सकता है , लेकिन आत्मा का प्रेम अन्नत हो जाता है। साधारण व्यक्ति के लिए प्रेम को जान पाना उतना ही कठिन है जितना की अँधेरे में किसी चिराग को ढूंढने की कोशिश करना।
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प्रेम एक साधना |
प्रेम में खुद को हारना पडता है , और वहां वो हार भी आपको जीत का एहसास कराते हैं. हारने का अर्थ अपने अहम् को अपने मैं से है, न की बहार की कोई हार से। फिर देखिये कुछ अनछुए पहलु कैसे छुए पहलुओं में तब्दील हो जाता है.
अचानक ही मुझे कुछ पंक्तिया याद आ गयी जिसने भी लिखा है बिल्कुल ही सही लिखा है
" दर्द दिलो के कम हो जाते अगर मैं और तुम हम हो जाते "
आपने शायद पहले भी सुना ही होगा की जबतक हीर खुद को राँझा न समझे और राँझा खुद को हीर तबतक वो सही मायने में इश्क़ है ही नहीं।
" राँझा राँझा करदी वे , मैं आप राँझा होई "
प्रेम इतना सुन्दर होते हुए भी दुःख भरा होता है अक्सर , जो रिश्ते जान से प्यारा होता है कल को बेगाना सा हो जाता है दुखों का सैलाब हमारे सामने होता है। फिर हम उस प्रेम को कोसने लगते हैं की क्यों हुआ था हमे प्रेम ?
कभी लोग मरने की सोचते हैं तो कभी अवसाद ग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन मैं कहती हूँ आपसे की आप अगर वो प्यार के खुशनुमे पल याद करेंगे तो आपका प्यार आपको आंसू तो देगा लेकिन उसमे एक खुशी भी महसूस होगी।
याद कीजिये प्रेम का वो पल जब आप उसके या उसकी बातो पर अकेले अकेले मुस्कुरा उठते थे , जब उनकी उँगलियों की पोरे आपके सर पर हाथ फेरती थी तो आपको वो एहसास होता था की दुनियां में गम के बादल ने आपको घेरा ही नहीं है। जबकि ये मात्र एक एहसास था उस वक्त भी और आज भी। परेशानियां तब भी थी आज भी है और कल भी रहेंगी। प्यार न सही जीवन में प्यार के एहसास को महसूस करके ही रोमांचित हो जाइये ताकि फिर से जीने की तम्मना जाग उठे और कुछ कर गुजरने की। ... प्रेम में एक समर्पण होना चाहिए जैसे ईश्वर को आपने कोई वस्तु अर्पित की हो। अगर आपका प्रेम सच्चा और सहृदय वाला होगा तो देर से ही सही आपके प्रेम को सफलता मिलती है.
वहीँ प्रेम का दूसरा पहलु अगर हम देखे तो पाते है की प्रेम सफल होकर भी विफल हो गया। लेकिन मेरे हिसाब से अगर प्रेम दो आत्माओ का मिलन है तो हमेशा सफल है और अमर है। शारीरिक प्रेम आपको पल भर के लिए पूर्णता का एहसास करा सकता है किन्तु वो सही मायने में प्रेम नहीं है। अगर ऐसा होता तो सबसे ज्यादा प्रेम पति और पत्नी के रिश्तों में होना चाहिए था। पति - पत्नी जीवनसाथी होते हैं उसमे एक बंधन होता है एक स्वार्थ निहित प्रेम होता है कही न कही , जबकि प्रेम मुक्ति का मार्ग है जो की हमे पशु से थोड़ा अलग बनाता है एक सच्चा इंसान.. बनाता है आपको। बंधन वाला प्रेम होकर भी जो बंधन रहित हो वही प्रेम है। प्रेम में बस ऐसे ही हादसे होते है की फिर हम कोई अरमान न कर सके , लेकिन जो भी हो पल चाहे खुशी के हो या गम के प्रेम में पलके भीगी ही होती है।
फिर भी ये दिल यही कहता है कि " काँटों से खींच के ये आँचल बंधन ये प्यार का , कि आज फिर जीने की तम्मना है मरने का इरादा है कि तुमसे एक वादा है।
प्रेम का विषय इतना गहरा है की एक पोस्ट में उसे लिखा या समझा नहीं जा सकता।

बहुत अच्छा प्यार इतना आसान नहीं
ReplyDeleteThanks
ReplyDeleteकमाल की लिखती हो...हर दिन इश्क होती हैं मुझे आपके शब्द से😍😊
ReplyDeleteवो लेखनी क्या जो पाठको को दिवाना ना बना दे और अपने शब्दों से उन्हे सोचने पर अमादा ना कर दे
ReplyDeleteप्रेम की ताकत में हर कोई भूल जाता है अपनी ताकत
ReplyDeleteवो प्रेम ही हे जो याद आने पर बिना फोने के हिचकी से दिल खटखटा ता हे ओर दिल उसे बिना तार के कहता है कि उसने मुझे याद किया
Nice nitu mem ese hi aap dillo ki baate jubaa par late rahoge
ReplyDeleteमेरे मन मे कुछ सवाल हैं
ReplyDelete-प्रेम की आवश्यकता क्यों है?
-आत्मा बिना मिले नहीं रह सकते?
-आत्मा के मिलन के लिए प्रेम ही क्यों? दूसरा कोई रास्ता नहीं?
-मेरी समझ है कि प्रेम से ज्यादा अच्छा विषय आनंद है
- आनंद पल-पल और हरपल हो, जो कि हमारे आत्मा को तृप्त करता रहे।
achha sawal kiya aapne .Prem mukti ka dwar hai ,basharte bandhan rahit prem ho .Prem hoga to annand hi annand hai .Chahe wo ishwar se prem kare ya kisi se .lekin sachhe man se aur ek sadhna ki tarah hona chahiye .Aatma bine mile bhi rah sakte hain lekin waha ekakipan sa mehsus hota hai .Prem me purnta k liye aatma ka milan jaruri hai . Ishwar ko hum dekh nahi sakte lekin unke banaye hue chhavi me unki jhalak dekh sakte hai .Prem mukti ka dwar hai .
ReplyDeleteNice start
ReplyDeleteThanks
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