Wednesday, March 20, 2019

SPARSH: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता

SPARSH: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता: पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता  भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है , लोगों का कहना है कि  पश्चिमी सभ्यता ने भारत को अपने मोहपाश...

Tuesday, March 19, 2019

पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता



पूर्वी सभ्यता बनाम पश्चिमी सभ्यता 


भारतीय संस्कृति विलुप्त होती जा रही है , लोगों का कहना है कि  पश्चिमी सभ्यता ने भारत को अपने मोहपाश में जकड़  रखा है।  लेकिन ये कहना कहाँ तक न्यायसंगत है ? समाज पूर्वी हो या पश्चिमी दोनों की अपनी संस्कृति है।  चाहे देश कोई भी हो उसकी संस्कृति उसकी आत्मा होती है।  किसी भी सिक्के के दो पहलू हो सकते हैं , अब इसमें हमे तय  करना होता है की हम उनमे से किसका आवरण करते हैं। एक तरफ हम जहाँ गगन छूने की बातें करते हैं तो वही दूसरी ओर हमें पश्चिमीकरण का डर भी सताने लगता है. यहाँ हमे आरोप प्रत्यारोप करने की बजाय उन जड़ो तक पहुंचना होगा जिसने हमे पश्चिमी सभ्यता का रुख  करने को बाध्य किया है।  पश्चिमी संस्कृति से भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है, जैसे उनके काम करने के तरीके , विज्ञान की दुनियां में उनके बढ़ते हुए कदम , नित्य नयी तकनीक का विकास।   तकनीक का उपयोग और दुरूपयोग हमारे ऊपर निर्भर करता है ना कि  पाश्चात्य सभ्यता को गलत ठहराया जा सकता है पूर्णरूप से। युवा वर्ग में तनाव ने अपनी एक खास जगह बना ली है , इसका कारण पाश्चात्य सभ्यता नहीं है बल्कि एकल परिवार है  . दादी माँ की परियो की कहानी की जगह अब पब जी  गेम ने ले लिया है , जिससे हमारे मानसिक संतुलन ठीक नहीं रह पाता है।  भारत में बढ़ती बेरोजगारी  सबसे अहम्  मुद्दा है जो हमें पश्चिमीकरण की  तरफ ढ़केल  रहा  है।  कभी  सोने की चिड़या  कहा जाने वाला भारत एक कृषि प्रधान देश है , लेकिन बेहतर कृषि तब ही संभव है जब प्रकृति हमारा साथ दे और नयी तकनीक का हम सहारा ले सकें और अच्छी तकनीक के लिए हमें  पश्चिमी सभ्यता  को अपनाना होगा।  हमारा भारत सभ्यता और संस्कृति के मामले सर्वश्रेष्ठ है, ये सर्वविदित है।

अब सवाल उठता है कि क्या भारत को विकसित देश होने के लिए पाश्चात्य की तरफ रुख करना सही है? क्या युवा वर्ग पाश्चात्य की तरफ रुख करके उनके गुलाम बनते जा रहे हैं ? मेरे हिसाब से   किसी जगह की संस्कृति अपनाने का मतलब ये नहीं की हम अपनी जड़ो को ही हिला दें. आधुनिक सोच के साथ कपड़ों में सहूलियत के साथ कुछ बदलाव आना भी लाज़मी है लेकिन   ये अब हम पर निर्भर करता है कि किसी दूसरे की संस्कृति को अपनाने में खुद की संस्कृति को गौण  न कर दें. मात्र जीन्स या साड़ी के पहनावे मात्र से किसी भी इंसान की सभ्यता और संस्कृति नहीं बदल सकती। हमारा पोशाक चाहे जो भी हो बदलते ज़माने के हिसाब से हो सकता है पर उस पहनावे में फुहड़ता और सस्तापन नहीं होना चाहिए।  ये पूरी तरह से किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर निर्भर है कि वो भारत से बाहर जाकर भी अपनी संस्कृति से विमुख नहीं हो।
अचानक से हमें यहाँ इकबाल जी की कही हुई बात याद आ रही है :

" कुछ बात है कि ऐसी हस्ती मिटती  नहीं हमारी  "

 हमें कोई हक़ नहीं बनता की हम दूसरों की संस्कृति को गलत कह सके वो भी तब जब हम उसे खुद अपना रहें हो। किसी भी देश का विकास तब सम्भव है जबकि पश्चिम के भौतिकवाद और पूर्व के अध्यातमवाद का सामंजस्यपूर्ण सम्मिश्रण जो समस्त संसार को प्रसन्नता दे सके। आजतक भारत की कोई अपनी शिक्षा निति नहीं  है , आज भी शिक्षा प्रणाली में भारत मैकाले की दी हुई पद्धति अपना रहा है। इस तरह की शिक्षा नीति  में मानवीय विकास के कई  पहलूओं की अनदेखी की गयी है। वहीँ अगर हम मानसिक सुदृढ़त्ता की बात करें तो भौतिकवादी सोच में ये नष्ट होते हुए प्रतीत हो रहें हैं।
यदि हम मानवीय मूल्यों के विकास की बात करें तो वो आध्यात्मिक चिंतन से विकसित होता है , जो कि  पाश्चात्य संस्कृति के आधीनता में  अस्वीकार्य  है।  तकनीक का सही उपयोग की जगह उसका दुरूपयोग ने मानवीय रिश्तों में दरार बढ़ाया है , लोगो में भावनात्मकता की कमी साफ़ झलकती है।  हर एक इंसान आगे बढ़ने की होड़ में है  एक दूसरे से , बिना परिणाम की चिंता किये हुए।

इसलिए हम ये कह सकते हैं कि कोई भी संस्कृति पूरी तरह से दोषपूर्ण नहीं है , बस उसका सदुपयोग करके हम विनाश से बच सकते हैं. मनुष्य का पतन और उत्थान अपने हाथ में है वो किसी संस्कृति का मोहताज नहीं , बस देश को  विकासशील से विकसित बनाने के  लिए पूर्वी और पश्चिमी  का आपसी  तालमेल होना जरुरी है। जब उदारीकरण और वैश्वीकरण  होंगे तो उसके परिणाम भी हमें ही झेलने होने चाहे उसका रुख पूर्व की ओर  जाता हो या पश्चिम की ओर।  अब हम अपनी संस्कृति की साख को हिलने न दे ये पूर्ण रूप से मानव पर निर्भर करता है. 

Monday, February 25, 2019

भारतीय गैस उद्योग के विकास में मौके और चुनौतियां; डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई



भारतीय गैस उद्योग के विकास में मौके और चुनौतियां; डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई

नई दिल्ली, 25 फरवरी 2019 -  राजधानी  में   22  फरवरी 2019 को एक दिवसीय  कार्यशाला का आयोजन किया गया था । इसका विषय था, “भारत में प्राकृतिक गैस उद्योग : भारतीय गैस उद्योग में मौके और चुनौतियां”। यह आयोजन पीडीपीयू-जीटीआई भारतीय गैस उद्योग के साथ मिलकर किया गया। इसमें इस क्षेत्र के जाने-माने वक्ताओं   ने उद्योग की मौजूदा स्थिति की समीक्षा की और उसपर प्रकाश डाला। 
प्राकृतिक गैस उद्योग  कार्यशाला २०१९ पीडीपीयू द्वारा  आयोजित 

यह कार्यशाला 2017 में  प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की व्यक्त इच्छा का परिणाम था । उस समय उन्होंने कहा था कि भारत में प्राकृतिक गैस के विकास के लिए वे चाहेंगे कि गैस टेक्नालॉजी इंस्टीट्यूट, इलिनोइस और पंडित दीन दयाल उपाध्याय पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी (पीडीपीयू), गांधीनगर के बीच एक गठजोड़ की शुरुआत की जाए।  

इस सिलसिले में पीडीपीयू ने अप्रैल 2018 में एक ओपन हाउस का आयोजन किया था। इसमें चर्चा का विषय था, “इंडिया टुवार्ड्स गैस बेस्ड इकनोमी” (भारत गैस आधारित अर्थव्यवस्था की दिशा में)। इसमें डेविड कैरोल, प्रेसिडेंट, आईजीयू और सीईओ जीटीआई ने मौजूद लोगों को संबोधित किया था और भारत के प्राकृतिक गैस क्षेत्र के विकास के लिए अपने विचार तथा दृष्टिकोण साझा किए थे। इस कदम को आगे बढ़ाते हुए, पीडीपीयू और जीटीआई ने अब इस कार्यशाला का आयोजन किया है।  
आईजीयू के इमीडिएट पास्ट प्रेसिडेंट और सीईओ डेविड कैरॉल

इंटरनेशनल गैस यूनियन (आईजीयू) के इमीडिएट पास्ट प्रेसिडेंट और सीईओ डेविड कैरॉल ने “प्राकृतिक गैस विकास पर अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य" पर अपने विचार रखे। अपनी प्रस्तुति की शुरुआत उन्होंने 2017 के वर्ल्ड गैस कांफ्रेंस की द्रुत समीक्षा से की और बताया कि दुनिया के हर कोने में और मुख्य रूप से चीन में गैस की मांग काफी बढ़ गई है। यही नहीं, एशियाई स्पॉट बाजार में कीमतें बढ़ गई हैं।  

उन्होंने आगे कहा, “2018 के आंकड़े अभी आ रहे हैं पर यह स्पष्ट है कि एशियाई बाजार मांग बढ़ा रहे हैं। और एफएलएनजी प्रील्यूड ने अभी कुछ महीने पहले उत्पादन शुरू किया है तो आपूर्ति पक्ष अच्छा है और अमेरिकी सप्लाई भी बहुत बढ़ गई है। आईईए ने अनुमान लगाया है कि 2040 तक गैस की वार्षिक मांग में 
1.6% की वृद्धि होगी। शहरीकरण और शहरी क्षेत्रों में खराब हवा का मामला आबादी के ज्यादातर हिस्से और इसके परिणामस्वरूप इन क्षेत्रों में प्राकृतिक गैस के विकास को प्रभावित कर रहा है।” 

गैस टेक्नालॉजी इंस्टीट्यूट में बिजनेस डेवलपमेंट एंड एजुकेशन के रॉड रिनहोल्म ने अमेरिका में गैस उद्योग के परिदृश्य साझा किए। उन्होंने अमेरिकी प्राकृतिक गैस आपूर्ति श्रृंखला का संक्षिप्त विवरण दिया जहां उन्होंने अमेरिका की स्थिति बदलने पर जोर दिया। इस समय अमेरिका गैस का आयात करता है और यह गैस का निर्यात करने वाला देश बन सकता है। और 2019 के अंत तक इसका लक्ष्य इसके निर्यात का दुगना है। उन्होंने कहा, “अमेरिका निरंतर अपने गैस डोमेन में जा रहा है। यह मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बंटा हुआ है – आवासीय, व्यावसायिक और बिजली पैदा करने वाला औद्योगिक गैस।“ 
  
                     डॉ. अनिरबिड सिरकर, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ पेट्रोलियम टेक्नालॉजी, पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी


डॉ. अनिरबिड सिरकर, प्रोफेसर, स्कूल ऑफ पेट्रोलियम टेक्नालॉजी, पंडित दीनदयाल पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी ने विस्तार से मुख्य जानकारी और गैस उद्योग से जुड़े मुद्दे साझा किए जैसा कि वेब आधारित सर्वे तरीके में हाईलाइट किया गया है। इसे “सर्वे मंकी” कहा जाता है। इस रिपोर्ट में 12 भिन्न गैस कंपनियों के नजरिए पर रोशनी डाली गई। इनमें जीएसपीसी, ओएनजीसी, अडानी गैस जो दो परिप्रेक्ष्य पर आधारित है। इसके अलावा भारतीय गैस उद्योग के लिए मौके और भारतीय गैस उद्योग के विकास की चुनौतियों पर प्रकाश डाला गया। सिरकर ने कहा, “हम अपनी अर्थव्यवस्था  को गैस पर आधारित बनाना चाहते हैं। हमारे पास एक महत्वाकांक्षी योजना है जो 6.5 प्रतिशत से 15 प्रतिशत की भारी वृद्धि के लिए है। गैस का उपयोग तकरीबन सभी क्षेत्र में होता है वह चाहे पवर हो या सीजीडी या उर्वरक। हालांकि, हमारे देश में जो अहम चुनौतियां हैं वह पूर्वी भारत में पर्याप्त गैस आपूर्ति की चुनौती है जबकि प्राकृतिक गैस की कीमत अभी भी एक चुनौती है।”